वाराणसी – भारत में सतत एवं जलवायु-सहिष्णु सरसों उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, ए.डब्लू.एल.और सॉलिडरीडाड द्वारा संयुक्त रूप से ‘रीजनरेटिव मस्टर्ड मॉडल फार्म’ कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा है। यह पहल भारत सरकार के राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन के समर्थन में गई है। रबी सीजन 2025-26 के दौरान इस कार्यक्रम के तहत मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के 14 जिलों में 3,000 एकड़ क्षेत्र में 3,000 फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन खेत स्थापित किए गए, जिनके माध्यम से हजारों सरसों किसानों को वैज्ञानिक एवं पारिस्थितिकी रूप से टिकाऊ कृषि पद्धतियों से सीधे जोड़ा गया।
“एस.इ.ए ने लगातार अपने सरसों मॉडल फार्म का विस्तार किया है और उत्पादकता में स्पष्ट एवं मापनीय लाभ हासिल किए हैं। जो यात्रा 2019-20 में केवल 100 फार्म्स से शुरू हुई थी, वह इस रबी सीजन में 3000 मॉडल फार्म्स तक पहुँची है, जिनमें 26% उपज वृद्धि इस वर्ष दर्ज हुई। इस वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता पुनर्योजी कृषि पद्धतियों का सशक्त एकीकरण है। यह केवल उत्पादन बढ़ाने से आगे बढ़कर भारत में एक लचीली, पुनर्योजी और स्थायी सरसों उत्पादन प्रणाली निर्मित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”- संजीव अस्थाना, अध्यक्ष, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया।
“पुनर्योजी कृषि भारत में खेती का भविष्य है। खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता अब एक आकांक्षा नहीं बल्कि एक आवश्यकता है। सरसों भारत की अपार अप्रयुक्त क्षमता वाली सबसे प्राचीन तिलहन फसल है। हमारी साझा जिम्मेदारी है कि हम भारत को फिर सेसरसों समृद्ध बनाएं, लेकिन हमे जीवन देने वाली जमीन को बचाते हुए। ए.डब्लू.एल एक जिम्मेदार और पारदर्शी तिलहन आपूर्ति श्रृंखला बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, और सॉलिडरीडाड तथा एस.ई.ए के साथ हमारी साझेदारी इस विश्वास को दर्शाती है।”- अंग्शु मलिक, कार्यकारी उपाध्यक्ष, ए.डब्लू.एल.।
“सॉलिडरीडाडपुनर्योजी कृषि के प्रति प्रतिबद्ध है। इस कार्यक्रम के परिणाम बताते हैं कि हम सही दिशा में हैं। पुनर्योजी कृषि केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि मानसिकता में एक मौलिक परिवर्तन है। किसानों को टॉपिंग, जैव-आदान और एकीकृत कीट निगरानी जैसी पद्धतियों को अपनाते और स्वयं अपने खेतों में दोहराते देखना यही सच्चे और स्थायी परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली प्रमाण है।रीजनरेटिव मस्टर्ड मॉडल फार्म’ पहल यह दर्शाती है कि अच्छी पैदावार, ज्यादा लाभ और टिकाऊ खेती एक साथ संभव है। जैसे-जैसे भारत खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है, ऐसे सरल, वैज्ञानिक और किसान-केंद्रित मॉडल मजबूत और भविष्य के लिए कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे।”- डॉ. सुरेश मोटवानी, खाद्य तेल प्रमुख, सॉलिडरीडाड।
“सरसों मॉडल फार्म कार्यक्रम इस बात का उज्ज्वल उदाहरण है कि जब उद्योग, नागरिक समाज और कृषि समुदाय एक साझे उद्देश्य के साथ मिलकर काम करते हैं तो क्या संभव हो सकता है। हम गर्व से एक ऐसी पहल का समर्थन करते हैं जो न केवल किसानों की आजीविका बढ़ाती है, बल्कि भारत की खाद्य और खाद्य तेल सुरक्षा को भी सार्थक और स्थायी तरीके से आगे बढ़ाती है।”— श्री विजय डाटा, अध्यक्ष, एसईए रेप-सरसों संवर्धन परिषद
“यह कार्यक्रम स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि उत्पादकता और स्थिरता परस्पर विरोधी नहीं हैं बल्कि एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने पर ये एक-दूसरे को सुदृढ़ करते हैं। वैज्ञानिक पुनर्योजी कृषि सिद्धांतों को किसानों के जीवन अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़कर हम एक व्यावहारिक और बड़े पैमाने पर लागू होने योग्य मॉडल बना रहे हैं जो आयात-निर्भरता घटाते हुए पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करता है।”— डॉ. बी.वी. मेहता, कार्यकारी निदेशक, एसईए ।
भारत अपनी खाद्य तेल आवश्यकताओं का 60% से अधिक आयात करता है, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है। सरसों देश की सबसे महत्वपूर्ण घरेलू तिलहन फसलों में से एक है। 2021-22 में, भारत सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य तिलहन उत्पादकता और उत्पादन को बढ़ाकर इस निर्भरता को कम करना है।
इस राष्ट्रीय आह्वान के समर्थन में एस.इ.ए,सॉलिडरीडाड और ए.डब्लू.एल के सहयोग से पुनर्योजी सरसों मॉडल फार्म कार्यक्रम तैयार किया। यह एक समग्र प्रदर्शन-आधारित पहल है जो आधुनिक कृषि विज्ञान और पुनर्योजी सिद्धांतों को मिलाकर उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और सरसों उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र को लंबे समय के लिए सशक्त बनाने पर केंद्रित है।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत तीन प्रमुख सरसों उत्पादक राज्यों में, चयनित अग्रणी किसानों के माध्यम से लगभग 3000 एकड़ क्षेत्रको कवर किया गया।मध्य प्रदेश में 1580 फ्रंटलाइन डेमो का संचालन मंदसौर, नीमच, रतलाम, शाजापुर, आगर-मालवा, विदिशा और रायसेन जिलों में किया गया।राजस्थान में 1320 डेमो प्लॉट बारां, बूंदी, कोटा, झालावाड़ और टोंक जिलों में संचालित किए गए, जबकि हरियाणा में 100 फ्रंटलाइन डेमोरेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जिले में लगाए गए।
किसानों की भागीदारी और ज्ञान को मजबूत करने के लिए 27 किसान फील्ड स्कूलस्थापित किए गए। यह स्कूल डेमो प्लॉट्स के पास बनाए गए, जो निरंतर सीखने, व्यावहारिक प्रदर्शन और किसानों के बीच आपसी ज्ञान साझा करने के केंद्र के रूप में कार्य कर रहे हैं।