गॉलब्लैडर (पित्ताशय) कैंसर भारत में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है, विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्रों में, जिसमें उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्य शामिल हैं। इस बीमारी के स्पष्ट शुरुआती लक्षण नहीं होते और इसके संकेत अक्सर सामान्य गॉलब्लैडर संबंधी समस्याओं समझ लिए जाते हैं, जिस कारण अधिकतर मामलों में इसका पता देर से और एडवांस स्टेज में चलता है। फरवरी को गॉलब्लैडर कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है, ऐसे में इसके चेतावनी संकेतों और उपलब्ध उपचार विकल्पों के बारे में जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है ताकि इस बीमारी का बोझ कम किया जा सके।
नानावती मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल केHPB एवं GI सर्जरी विभाग के वाइस चेयरमैन और ग्रोथ एवं स्ट्रेटेजी, ऑन्कोलॉजी विभाग के,लीड डॉ. गणेश नागराजन ने बताया “गॉलब्लैडर कैंसर के सामान्य रेड फ्लैग संकेतों में पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में लगातार दर्द, आंखों या त्वचा का पीला पड़ना (पीलिया), लगातार मतली या उल्टी, बिना कारण वजन कम होना, बुखार, कुछ मामलों में पेट में गांठ महसूस होना या पित्त नली में रुकावट के लक्षण शामिल हैं। यदि गॉलस्टोन (पित्त की पथरी) और लंबे समय से सूजन की समस्या पर्यावरणीय और लाइफस्टाइल फैक्टर्स के साथ मौजूद हो, तो जोखिम बढ़ जाता है। उत्तर भारत में किए गए अध्ययनों के अनुसार, प्रदूषित पानी—जिसमें हेवी मेटल्स या इंडस्ट्रियल केमिकल्स हो सकते हैं—का सेवन और तंबाकू का उपयोग इस क्षेत्र में गॉलब्लैडर कैंसर के बढ़ते मामलों के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
डॉ. गणेश ने आगे बताया “इस बीमारी का इलाज उसकी स्टेज पर निर्भर करता है। यदि कैंसर शुरुआती और लोकलाइज्ड स्टेज में पकड़ा जाए, तो सर्जरी इलाज का सबसे प्रभावी विकल्प है। इसमें केवल गॉलब्लैडर निकालने से लेकर अधिक व्यापक “रैडिकल” सर्जरी तक शामिल हो सकती है, जिसमें आसपास के लिम्फ नोड्स और लिवर का एक छोटा हिस्सा भी हटाया जाता है ताकि बीमारी पूरी तरह साफ की जा सके। एडवांस मामलों में उपचार का उद्देश्य कैंसर को कंट्रोल करना और पित्त नली की रुकावट को कम करना होता है। इसके लिए ड्रेनेज या बायपास प्रोसीजर, स्टेंटिंग, कीमोथेरेपी और चुनिंदा मामलों में रेडियोथेरेपी का सहारा लिया जाता है ताकि लोकल बीमारी और लक्षणों को नियंत्रित किया जा सके।“